"ऐ अबा अब्दिल्लाह! मैं आप पर सलाम भेजता हूँ, उस दर्द और मुसीबत पर जो आपने झेली। आप पर लानत हो उन लोगों की जिन्होंने आपके खिलाफ जंग की, आप पर लानत हो उन लोगों की जिन्होंने आपके मकतल (शहादत की जगह) की नींह रखी। मैं आपके दुश्मनों से बेज़ार हूँ, और आपके मकाम (उच्च स्थान) को क़ुर्बानी के तौर पर पेश करता हूँ।"
इस ज़ियारत में सिर्फ़ इमाम हुसैन (अ) ही नहीं, बल्कि कर्बला के अन्य सभी शहीदों जैसे हज़रत अब्बास, हज़रत अली अकबर, हज़रत अली असग़र और वफ़ादार साथियों के नामों का सिलसिलेवार ज़िक्र है और उन पर सलाम भेजा गया है।
इस्लामी विद्वानों के अनुसार, ज़ियारत-ए-नाहिया की तिलावत करने से इंसान को कई तरह के आत्मिक और मानसिक फ़ायदे मिलते हैं: ziyarat e nahiya in hindi
इसमें इमाम-ए-ज़माना फ़रमाते हैं, "अगर मैं कर्बला में न था तो मैं सुबह व शाम आप पर आंसू बहाता हूँ और आंसू के बदले खून रोता हूँ।"
"Assalamu ala Adamas safwatillahi min khaliqatihi..." سلام ہو آدمؑ پر جو اللہ کی مخلوق میں چنے ہوئے ہیں... سلام ہو نوحؑ پر جن کی دعا قبول ہوئی... سلام ہو ابراہیمؑ پر جن کو اللہ نے اپنا خلیل بنایا۔ "ऐ अबा अब्दिल्लाह
ज़ियारत-ए-नाहिया का हिंदी अनुवाद (मुख्य अंश)
1. पैगंबरों और इमामों पर सलाम سلام ہو ابراہیمؑ پر جن کو اللہ نے
मैं गवाही देता हूँ कि आप शहीद हुए, और आपके अहले-बैत (परिवार) को कैद किया गया, और आपके खून को बहाया गया अत्याचारियों क
اس زیارت کے الفاظ اتنے پردرد ہیں کہ سخت سے سخت دل بھی پگھل جاتا ہے اور آنکھوں سے اشکِ غم جاری ہو جاتے ہیں۔ یہ زیارت کب پڑھی جانی چاہیے؟
یہ وہ زیارت ہے جس میں امام حسینؑ کے مصائب پر گریہ کیا گیا ہے اور کربلا کے مقتل کا نقشہ کھینچا گیا ہے۔
जब इमाम का घोड़ा (ज़ुलजनाह) ख़ाली ख़ेमे की तरफ़ पलटा, तो अहले-बैत (इमाम का परिवार) समझ गया कि इमाम शहीद हो चुके हैं।